
देशभर में आज गणेश चतुर्थी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। भक्त घर-घर में भगवान गणपति की मूर्तियां स्थापित कर रहे हैं। इस मौके पर उत्तराखंड के एक मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है।
ये खास जगह है, उत्तरकाशी का डोडीताल। समुद्र तल से 3 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर मौजूद इस जगह में ही मां पार्वती ने भगवान गणेश को जन्म दिया था। यहां भगवान गणेश को स्थानीय लोग ‘डोडीराजा’ भी कहते हैं।
पास ही मां अन्नपूर्णा का मंदिर है, जिन्हें स्थानीय परंपरा में माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। यहां मां और बेटे की पूजा साथ होती है। यही वजह है कि डोडीताल को स्थानीय आस्था में गणेश जन्मभूमि के रूप में खास स्थान मिला हुआ है।
गणेश से गजानन बने
उत्तरकाशी से संगमचट्टी की ओर जाने के बाद आगे का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। जंगलों के बीच से गुजरते हुए जब डोडीताल सामने आता है। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में मां पार्वती स्नान करने गई थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डालकर उसे अपना पुत्र बना लिया। जाते समय उन्होंने गणेश को द्वार पर खड़ा किया और कहा कि उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने दिया जाए।

कुछ देर बाद भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश ने उन्हें भी अंदर जाने से रोक दिया। भगवान शिव के कहने के बाद भी भगवान गणेश अपनी मां की आज्ञा पर अडिग रहे। विवाद बढ़ा और दोनों के बीच युद्ध हो गया। आखिरकार भगवान शिव ने गणेश का सिर काट दिया। जब माता पार्वती को इसकी जानकारी मिली तो वह क्रोधित हो उठीं। इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को पुनर्जीवन दिया और उनके शरीर पर हाथी का सिर लगाया। इसी के बाद गणेश गजानन कहलाए।
‘डोडीराजा’ नाम के पीछे भी है कहानी
डोडीताल में गणेश को सिर्फ गणेश कहकर नहीं पुकारा जाता। स्थानीय लोग उन्हें डोडीराजा कहते हैं। स्थानीय परंपरा में इस नाम को स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित ‘डुंडीसर’ से जोड़कर देखा जाता है। कैलासू क्षेत्र के गांवों में आज भी गणेश जन्मभूमि के रूप में डोडीताल की मान्यता सुनाई जाती है।पुराण के श्लोक में गणेश के जन्म का उल्लेख
डोडीताल की इस मान्यता को स्थानीय लोग स्कंद पुराण के केदारखंड से भी जोड़ते हैं। केदारखंड के अध्याय 10 के श्लोक में गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है-
“साक्षात्प्रकृत्याः संभूतो गणेशो भगवानभूत्।
यथारूपः शिवः साक्षात्तद्रूपो हि गणेश्वरः॥”
स्थानीय व्याख्या में इसका अर्थ भगवान गणेश के प्रकृति से उत्पन्न होने से जोड़ा जाता है। इसी अध्याय में आगे गणेश और भगवान शिव के बीच हुए संघर्ष से जुड़े श्लोकों का भी उल्लेख मिलता है। यानी गणेश के जन्म और उनके गजानन स्वरूप की कथा को स्थानीय लोग पुराणों में वर्णित प्रसंगों के साथ जोड़कर देखते हैं।

मंदिर में साथ विराजते हैं मां-बेटे
स्थानीय मान्यता में मां अन्नपूर्णा को माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इसलिए यहां मां अन्नपूर्णा और भगवान गणेश की पूजा साथ की जाती है। श्रद्धालुओं के लिए यह सिर्फ दर्शन की जगह नहीं, बल्कि उस मां और बेटे की कहानी से जुड़ा स्थान है, जिसे वे पीढ़ियों से सुनते आ रहे हैं। यहां की लोकपरंपरा में एक गीत भी सुनाई देता है-
“गणेश जन्मभूमि डोडीताल कैलासू,
असी गंगा उद्गम अरू माता अन्नपूर्णा निवासू।”
इसमें डोडीताल को गणेश जन्मभूमि और मां अन्नपूर्णा के निवास से जोड़ा गया है।
गणेश चतुर्थी पर होती है विशेष पूजा
गणेश चतुर्थी के दौरान डोडीताल की धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। जिन श्रद्धालुओं के लिए गणेश सिर्फ आराध्य हैं, उनके लिए यहां पहुंचना एक अलग तरह का अनुभव माना जाता है। क्योंकि यहां गणेश की पूजा के साथ उस जगह को देखने का अवसर भी मिलता है, जिसे स्थानीय परंपरा उनका जन्मस्थान मानती है।
केदारखंड में पूजा की विधि का उल्लेख
गणेश से जुड़ी मान्यता सिर्फ जन्म की कहानी तक सीमित नहीं है। केदारखंड के अध्याय 11 में गणेश की पूजा का उल्लेख भी मिलता है। श्लोक में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश की पूजा करने की बात कही गई है। स्थानीय लोग इन धार्मिक संदर्भों को डोडीताल की गणेश परंपरा से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इस क्षेत्र की पहचान सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं में रही है।
स्वामी तपोवन की किताब में भी डोडीताल का जिक्र
डोडीताल को गणेश की जन्मभूमि मानने वाली परंपरा का उल्लेख स्वामी तपोवन की पुस्तक ‘हिमगिरि विहार’ के संदर्भ में भी किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसमें डोडीताल को गणेश की जन्मभूमि बताया गया है। कैलासू क्षेत्र के ग्रामीण भी लंबे समय से इस मान्यता को आगे बढ़ाते आए हैं।



